कविता कोश – यशोधरा, ग़ज़ल, गुलज़ार

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कविताएँ कविता का सबसे सामान्य रूप हैं, लेकिन इसका क्या अर्थ है? कविताएँ साहित्य के छोटे टुकड़े हैं जो लयबद्ध शैली में लिखे गए हैं। कविता का उद्देश्य भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करना या यादें जगाना है। वे आम तौर पर उन छंदों से बने होते हैं जिनकी एक तुकबंदी होती है और कुछ काव्य तकनीकों का अनुसरण करते हैं।

कविता अपने सबसे शक्तिशाली, भावनात्मक रूप में भाषा की कला है। कविताओं को अक्सर संरचना में अपेक्षाकृत सरल और लंबाई में छोटा माना जाता है, लेकिन हमेशा ऐसा नहीं होता है।

कवियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ है कि वे उन शब्दों के पूर्ण अर्थ को समझने के लिए परामर्श करें जिनसे वे परिचित नहीं हो सकते हैं या अपने स्वयं के काम के लिए नए शब्दों की खोज कर सकते हैं।

सबसे पहले ज्ञात काव्य शब्दकोष जेरार्ड मर्फी द्वारा 1808 के आसपास लिखा गया था। इसका शीर्षक “ए डिक्शनरी ऑफ आयरिश पोएट्री” था और यह जोनाथन स्विफ्ट द्वारा “ए कलेक्शन ऑफ आयरिश पोएम्स” नामक एक पहले के काम पर आधारित था।

1808 में जेरार्ड मर्फी द्वारा सबसे पहले काव्य शब्दकोशों में से एक बनाया गया था। “आयरिश कविता का एक शब्दकोश” 1720 में जोनाथन स्विफ्ट द्वारा संकलित एक काम “आयरिश कविता का एक संग्रह” पर आधारित था। इस शब्दकोश ने विद्वानों और छात्रों को लेखकों की पहचान करने में मदद की, विषय, और यहां तक कि शीर्षक जो पहले उनके लिए अज्ञात थे।

राजकुमारी यशोधरा कौन थी और उसकी कहानी क्या है?

यशोधरा

राजकुमारी यशोधरा राजकुमार सिद्धार्थ की माँ थीं, जो बाद में बुद्ध बन गईं। कहानी तब शुरू होती है जब वह राजा सुधोदन के घर पैदा हुई थी।

कहानी तब शुरू होती है जब राजकुमारी यशोधरा का जन्म राजा सुशोधन के यहाँ हुआ था। वह बहुत सुंदर है और वह उसका नाम यशोधरा या ‘जिसका उद्देश्य पूरा हो गया है’ नाम देता है। उसके बाद वह उसके लिए एक समारोह आयोजित करता है जहां उसके जीवन में क्या हो सकता है, इसके बारे में अपनी भविष्यवाणी प्रस्तुत करने के लिए कई ब्राह्मणों को आमंत्रित किया जाता है।

एक ब्राह्मण भविष्यवाणी करता है कि अगर वह एक साधारण आदमी से शादी करती है, तो उसका जीवन सरल होगा लेकिन अगर वह राजकुमार से शादी करती है, तो वह दुनिया की आधी आबादी पर रानी होगी। यह भविष्यवाणी उसे राजकुमार से शादी करने या न करने के कठिन निर्णय की ओर ले जाती है। इस कहानी के माध्यम से यह देखा जा सकता है कि जीवन में किस प्रकार भिन्न-भिन्न परिणामों के साथ भिन्न-भिन्न पथ हैं।

माँ कह एक कहानी / मैथिलीशरण गुप्त

“माँ कह एक कहानी।”
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?”
“कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?
माँ कह एक कहानी।”

“तू है हठी, मानधन मेरे, सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ सुरभि मनमानी।”
“जहाँ सुरभि मनमानी! हाँ माँ यही कहानी।”

वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे, लहराता था पानी।”
“लहराता था पानी, हाँ-हाँ यही कहानी।”

“गाते थे खग कल-कल स्वर से, सहसा एक हंस ऊपर से,
गिरा बिद्ध होकर खग शर से, हुई पक्ष की हानी।”
“हुई पक्ष की हानी? करुणा भरी कहानी!”

चौंक उन्होंने उसे उठाया, नया जन्म सा उसने पाया,
इतने में आखेटक आया, लक्ष सिद्धि का मानी।”
“लक्ष सिद्धि का मानी! कोमल कठिन कहानी।”

“मांगा उसने आहत पक्षी, तेरे तात किन्तु थे रक्षी,
तब उसने जो था खगभक्षी, हठ करने की ठानी।”
“हठ करने की ठानी! अब बढ़ चली कहानी।”

हुआ विवाद सदय निर्दय में, उभय आग्रही थे स्वविषय में,
गयी बात तब न्यायालय में, सुनी सभी ने जानी।”
“सुनी सभी ने जानी! व्यापक हुई कहानी।”

राहुल तू निर्णय कर इसका, न्याय पक्ष लेता है किसका?
कह दे निर्भय जय हो जिसका, सुन लूँ तेरी बानी”
“माँ मेरी क्या बानी? मैं सुन रहा कहानी।

कोई निरपराध को मारे तो क्यों अन्य उसे न उबारे?
रक्षक पर भक्षक को वारे, न्याय दया का दानी।”
“न्याय दया का दानी! तूने गुनी कहानी।”

एक विशिष्ट ग़ज़ल कविता की रूपरेखा

ग़ज़ल एक ऐसी कविता है जिसके केंद्र में एक विषय होता है जिसमें दो अलग-अलग भावनाएँ जुड़ी होती हैं। इसकी निम्नलिखित विशेषताएं हैं: दोहे तुकबंदी करते हैं, इस कविता को बनाने वाले कितने दोहे हैं, इसकी कोई विशेष सीमा नहीं है, और उनमें प्रत्येक में कम से कम तीन पंक्तियाँ होनी चाहिए।

ग़ज़ल कविता कविता का एक प्राचीन रूप है जिसकी उत्पत्ति मध्य पूर्व में हुई थी। काव्य रूप सदियों से, यहां तक कि आधुनिक समय में भी कायम है। ग़ज़लें आमतौर पर अरबी या फ़ारसी में लिखी जाती हैं, हालाँकि वे कभी-कभी उर्दू और हिंदी में भी पाई जा सकती हैं।

ग़ज़ल दो भागों में विभाजित है। कविता के पहले भाग में दो तुकबंदी वाले दोहे (कुल चार पंक्तियाँ) होते हैं, जिनमें से प्रत्येक के अंत में एक छंद के साथ एक छंद होता है। दूसरी छमाही एक चौपाई (कुल आठ पंक्तियाँ) है, जो एक नई कविता योजना और संरचना का परिचय देती है जो पहली छमाही से भिन्न होती है।

ग़ज़ल की सामग्री ज्यादातर प्रेम और रोमांस के बारे में है, इसलिए इसे अक्सर पहले से लिखा जाता है।

अब तक की टॉप 6 ग़ज़लें

ग़ज़ल

1. अँधेरा है घना फिर भी ग़ज़ल पूनम की कहते हो / डी. एम. मिश्र

अँधेरा है घना फिर भी ग़ज़ल पूनम की कहते हो
फटे कपड़े नही तन पर ग़ज़ल रेशम की कहते हो।

ग़रीबों को नहीं मिलता है पीने के लिए पानी
मगर तुम तो ग़ज़ल व्हिसकी गुलाबी रम की कहते हो।

चले जब लू बदन झुलसे सुना तुमको मगर तब भी
हवायें नर्म लगती हैं ग़़ज़ल मौसम की कहते हो।

तुम्हें मालूम है सूखे हुए पत्तों पे क्या गुज़री
गुलों के नर्म होंठों पर ग़ज़ल शबनम की कहते हो।

तुम्हारे हुस्न के बारे में हमने भी है सुन रक्खा
हमारा जख़्म भी भर दो ग़ज़ल मरहम की कहते हो।

2. अगर हम दश्त-ए-जुनूँ में न ग़ज़ल-ख़्वाँ होते / सय्यद ज़मीर जाफ़री

अगर हम दश्त-ए-जुनूँ में न ग़ज़ल-ख़्वाँ होते
शहर होते भी तो आवाज़ के ज़िंदाँ होते

ज़िंदगी तेरे तक़ाज़े अगर आसाँ होते
कितने आबाद जज़ीरे हैं कि वीराँ होते

तू ने देखा ही नहीं प्यार से ज़र्रों की तरफ़
आँख होती तो सितारे भी नुमायाँ होते

इष्क़ ही शोला-ए-इम्कान-ए-सहर है वर्ना
ख़्वाब ताबीर से पहले ही परेशाँ होते

माज़ी ओ दोश का हर दाग़ है फ़र्दा का चराग़
काश ये शाम ओ सहर सर्फ़-ए-दिल-ओ-जाँ होते

ज़ब्त-ए-तूफ़ाँ की तबीअत ही का इक रूख़ है ‘ज़मीर’
मौज आवाज़ बदल लेती है तूफ़ाँ होते

3. अगर औरत बिना संसार होता / गिरधारी सिंह गहलोत

अगर औरत बिना संसार होता।
वफ़ा का ज़िक्र फिर बेकार होता।

ये किस्से हीर लैला के न मिलते।
हर एक आशिक़ यहाँ बेजार होता।

क़लम ख़ामोश रहता शायरों का
बिना रुजगार के फ़नकार होता।

नहीं फिर जिक्र होठों पर किसी के
नयन जुल्फ-ओ-लब-ओ-रुख़्सार होता।

न करता कोई बातें ग़म ख़ुशी की
किसी को कब किसी से प्यार होता।

सजावट धूल खाती फिर मकाँ की
लटकता आइना ग़मख़्वार होता।

सभी ख़ामोश होती महफ़िलें भी
नहीं फिर रूप का बाज़ार होता।

बहन माशूक मां बेटी ओ बीबी
बिना कोई न रिश्तेदार होता।

‘तुरंत ‘ अब ये हक़ीक़त और जानो
बिना औरत बशर क्या यार होता।

4. अंजाम से वाकिफ़ है मगर झूम रहा है / राजेंद्र नाथ ‘रहबर’

अंजाम से वाक़िफ़ है मगर झूम रहा है
वो फूल कि जो शाखे़-तमन्ना पे खिला है

तारीख़ के सफ्ह़ों ने जो देखा न सुना है
वो बाब मेरे अह्द के इंसां ने लिखा है

सुनने को जिसे गोश-बर-आवाज़ है दुन्या
वो गीत अभी साज़ के पर्दों में छुपा है

इक उम्र गुज़ारी है सुलगते हुये मैं ने
मैं ऐसा दिया हूं जो जला है न बुझा है

फ़ुट-पाथ का बिस्तर है तो है ईंट का तकिया
ये नींद के यूं कौन मज़े लूट रहा है

ठहरे हुये पानी की तहें चौंक पड़ी हैं
कँकर कोई यादों के सरोवर में गिरा है

आईनए-दिल में तू कभी देख उसे भी
इक और भी चेहरा तेरे चेहरे में छुपा है

इस राह से गुज़रो तो कभी तुम को सुनाऊं
इक गीत तुम्हारे लिये अश्कों से लिखा है

करता है इसे संग पे तह्रीर अबस तू
ऐ दोस्त तिरा नाम तो पानी पे लिखा है

5. अगर वो चैन-ओ-क़रार था तो उदासियाँ दे गया कहाँ वो / डी. एम. मिश्र

अगर वो चैन-ओ-क़रार था तो उदासियाँ दे गया कहाँ वो
मेरे तसव्वुर में आ के लेता जगह तुम्हारी खु़दा कहाँ वो।

जो उसने चाहा तो जी उठा मैं, जो उसने चाहा तो मर गया मैं
जो मौत को लंबी ज़िंदगी दे मैं ढूँढता हूँ दवा कहाँ वो।

न अब शिकायत, न कोई ग़ुस्सा,न मिलने की अब वो जुस्तजू ही
जो ला के मुझको यहाँ पे छोड़ा था रास्ता तो गया कहाँ वो।

वो वक़्त के हाथों की हो ख़ुशबू तो क्या बताऊँ पता मैं उसका
अभी-अभी तो यहीं कहीं था, अभी-अभी फिर गया कहाँ वो।

6. अखबार की समस्या / कमलेश द्विवेदी

है जीत की समस्या या हार की समस्या.
हमको न अब बताओ बेकार की समस्या.

ये मान लो कि तुमसे कुछ भी नहीं मैं कहता,
होती अगर जो केवल दो-चार की समस्या.

कछुआ भी रेस जीते जब वो चले निरन्तर,
हो लाख संग उसके रफ़्तार की समस्या.

चुटकी में हल किये हैं मुश्किल सवाल उसने,
पर कैसे हल करे वो परिवार की समस्या.

बीमार की दवाई में सब लगे हैं लेकिन,
कोई नहीं समझता बीमार की समस्या.

हमसे हैं लाख बेहतर दरिया-हवा-परिंदे,
सरहद,न हद,न कोई दीवार की समस्या.

हमको जो सच लगा है हमने वही लिखा है,
छापे-न छापे ये है अखबार की समस्या.

गुलज़ार विविध

गुलज़ार - Gulzar

गुलजार का पूरा नाम संपूर्ण सिंह कालरा है। आप “त्रिवेणी” छंदों के रचयिता और हिंदी फिल्म उद्योग के जाने-माने गीतकार हैं।

आपने 2000 से अधिक हिंदी गीतों और 100 उर्दू गीतों के बोल लिखे हैं। आपने 60 से अधिक हिंदी फिल्मों के लिए पटकथाएं, संवाद और पटकथाएं भी की हैं और साथ ही “खानदान” और “नौकर” जैसी फिल्मों में अभिनय किया है।

हम को मन की शक्ति देना / गुलज़ार

हम को मन की शक्ति देना, मन विजय करें
दूसरो की जय से पहले, ख़ुद को जय करें।

भेद भाव अपने दिल से साफ कर सकें
दोस्तों से भूल हो तो माफ़ कर सके
झूठ से बचे रहें, सच का दम भरें
दूसरो की जय से पहले ख़ुद को जय करें
हमको मन की शक्ति देना।

मुश्किलें पड़े तो हम पे, इतना कर्म कर
साथ दें तो धर्म का चलें तो धर्म पर
ख़ुद पर हौसला रहें बदी से न डरें
दूसरों की जय से पहले ख़ुद को जय करें
हमको मन की शक्ति देना, मन विजय करें।

पूरा दिन / गुलज़ार

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है,
झपट लेता है, अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं
गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं
“तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है, तुझे किश्तें चुकानी है ”
ज़बरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कह कर
अभी 2-4 लम्हे खर्च करने के लिए रख ले,
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,
जब होगा, हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं
अपने लिए रख लूं,
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन
बस खर्च
करने की तमन्ना है !!

रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है / गुलज़ार

रात चुपचाप दबे पाँव चली जाती है
रात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं
कांच का नीला सा गुम्बद है, उड़ा जाता है
ख़ाली-ख़ाली कोई बजरा सा बहा जाता है
चाँद की किरणों में वो रोज़ सा रेशम भी नहीं
चाँद की चिकनी डली है कि घुली जाती है
और सन्नाटों की इक धूल सी उड़ी जाती है
काश इक बार कभी नींद से उठकर तुम भी
हिज्र की रातों में ये देखो तो क्या होता है

देखो, आहिस्ता चलो / गुलज़ार

देखो, आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता ज़रा
देखना, सोच-सँभल कर ज़रा पाँव रखना,
ज़ोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं.
काँच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में,
ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जाये देखो,
जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जाएगा

ख़ुदा / गुलज़ार

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने
काले घर में सूरज रख के,
तुमने शायद सोचा था, मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे,
मैंने एक चिराग़ जला कर,
अपना रस्ता खोल लिया.
तुमने एक समन्दर हाथ में ले कर, मुझ पर ठेल दिया।
मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख दी,
काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा,
मैंने काल को तोड़ क़े लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया.
मेरी ख़ुदी को तुमने चन्द चमत्कारों से मारना चाहा,
मेरे इक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया
मौत की शह दे कर तुमने समझा अब तो मात हुई,
मैंने जिस्म का ख़ोल उतार क़े सौंप दिया,
और रूह बचा ली,
पूरे-का-पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाज़ी।

इक इमारत / गुलज़ार

इक इमारत
है सराय शायद,
जो मेरे सर में बसी है.
सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते हुए जूतों की धमक,
बजती है सर में
कोनों-खुदरों में खड़े लोगों की सरगोशियाँ,
सुनता हूँ कभी
साज़िशें, पहने हुए काले लबादे सर तक,
उड़ती हैं, भूतिया महलों में उड़ा करती हैं
चमगादड़ें जैसे
इक महल है शायद!
साज़ के तार चटख़ते हैं नसों में
कोई खोल के आँखें,
पत्तियाँ पलकों की झपकाके बुलाता है किसी को!
चूल्हे जलते हैं तो महकी हुई ‘गन्दुम’ के धुएँ में,
खिड़कियाँ खोल के कुछ चेहरे मुझे देखते हैं!
और सुनते हैं जो मैं सोचता हूँ !
एक, मिट्टी का घर है
इक गली है, जो फ़क़त घूमती ही रहती है
शहर है कोई, मेरे सर में बसा है शायद!

अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो / गुलज़ार

अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्ताँ आगे और भी है
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!
अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी, अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं
अभी तो किरदार ही बुझे हैं
अभी सुलगते हैं रूह के ग़म, अभी धड़कते हैं दर्द दिल के
अभी तो एहसास जी रहा है
यह लौ बचा लो जो थक के किरदार की हथेली से गिर पड़ी है
यह लौ बचा लो यहीं से उठेगी जुस्तजू फिर बगूला बनकर,
यहीं से उठेगा कोई किरदार फिर इसी रोशनी को लेकर,
कहीं तो अंजाम-ओ-जुस्तजू के सिरे मिलेंगे,
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!

जगजीत: एक बौछार था वो… / गुलज़ार

एक बौछार था वो शख्स,
बिना बरसे किसी अब्र की सहमी सी नमी से
जो भिगो देता था…
एक बोछार ही था वो,
जो कभी धूप की अफशां भर के
दूर तक, सुनते हुए चेहरों पे छिड़क देता था
नीम तारीक से हॉल में आंखें चमक उठती थीं

सर हिलाता था कभी झूम के टहनी की तरह,
लगता था झोंका हवा का था कोई छेड़ गया है
गुनगुनाता था तो खुलते हुए बादल की तरह
मुस्कराहट में कई तरबों की झनकार छुपी थी
गली क़ासिम से चली एक ग़ज़ल की झनकार था वो
एक आवाज़ की बौछार था वो!!

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